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01.वहय की शुरुआत (Hadith no 01-07)

 

"मै शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम से वो बड़ा ही निहायत रहम और करम करने वाला है अल्लाह के सिवा कोई माबूद नही ओर सभी तारीफ अल्लाह ही के लिए है "


उमर बिन खताब रजि अल्लाह तआला अन्हो से रिवायत है नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते है कि "सवाब के तमाम काम नियतो पर टिके है और हर व्यक्ति को उसकी नीयत के मुताबिक इनाम मिलेगा। इसलिए जो कोई दुनिया कमाने या किसी औरत के साथ शादी करने के लिए वतन छोड़ता है, तो उसकी हिज़रत उसी काम के लिए है जिसके लिए उसने हिज़रत की होगी। वाजेह रहे कि हर अच्छे काम के लिए आपकी नियत भी अच्छी होनी चाइये वरना न सिर्फ सवाब से महरूमी होगी बल्कि अल्लाह के यहा सख्त सजा का डर भी है ओर जो अमाल खालिस दिल से मुताल्लिक है मसलन डर व उम्मीद वगैरा, इनमे नियत की कोई जरूरत नही। नीज़ नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तरफ नुजुले वहय का सबब आपका इख्लास ए नियत है।

Note:- "वहय" जो आगे कई बार आएगा उसका मतलब है की अल्लाह की तरफ से आने वाले हुकुम।


हजरता आएशा रजि अल्लाह तआला अन्हो से रिवायत है कि अल-हरिथ बिन हिशम ने अल्लाह के रसूल से पूछा "ऐ अल्लाह के रसूल ! आपको वहय कैसे आती है ?" अल्लाह के रसूल ने फरमाया , "कभी-कभी यह घंटी बजने की तरह होता है, वहय की यह सूरत मुझ पर बहुत भारी पड़ती है और फिर जब फरिश्ते का पैगाम मुझे याद हो जाता है तो यह बंद हो जाती है ओर कभी-कभी फरिश्ता इंसान की शक्ल में भी आता है और मुझसे बात करता है और जो कुछ वो मुझसे कहता है मै उसे याद कर लेता हूं। " आयशा रजि अल्लाह तआला अन्हो का बयान है कि मैंने पैगंबर को बहुत ही सख्त ठंडे दिनो में भी जब वहय आती थी ओर जब वह बंद होती तो उनकी पेशानी से पसीना गिर रहा होता।


आएशा रजि अल्लाह तआला अन्हो से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल को वहय की शुरुआत सच्चे ख्वाबो की शक्ल में हुई आप जो कुछ ख्वाब देखते वो दिन की रोशनी की तरह सच साबित होते और फिर आप को तन्हाई पसंद हो गयी। हिरा नाम की गुफा में आप तन्हाई इख्तियार करते और कई दिन आप घर तशरीफ़ लाये बगैर आप इबादत में लगे रहते। आप अपने साथ खाने पीने का सामान लेते ओर कुछ रोज़ वहा गुजारते और फिर वापस खदीजा रजि अल्लाह तआला अन्हो के पास लौटते ओर फिर इतने ही दिनों का सामान लेकर वापस चले जाते। एक दिन गुफा में अचानक एक फरिश्ता आया और उसने आपको पढ़ने के लिए कहा। पैगंबर ने जवाब दिया, "मुझे नहीं पता कि कैसे पढ़ना है।“ फरिश्ते ने मुझे कसके पकड़ा और यहा तक कि मेरी बर्दाश्त के बाहर हो गया और फिर उसने मुझे छोड़ दिया फिर मुझे पढ़ने के लिए कहा और मैंने जवाब दिया, 'मुझे नहीं पता कि कैसे पढ़ा जाए।' उसके बाद उसने मुझे फिर से पकड़ लिया और मुझे दूसरी बार दबा दिया जब तक कि मैं इसे और सहन नहीं कर सका। फिर उसने मुझे छोड़ दिया और फिर मुझे पढ़ने के लिए कहा लेकिन फिर मैंने जवाब दिया, 'मुझे नहीं पता कि कैसे पढ़ा जाए (या मैं क्या पढ़ूं)? उसके बाद उसने मुझे तीसरे बार पकड़ा और मुझे दबा दिया, और फिर मुझे छोड़ दिया और कहा, 'पढ़ो अपने रब के नाम से, जिसने तुम्हे बनाया है ओर तुम्हारा रब तो निहायत करीम है अल्लाह के रसूल उन आयतो को लेकर वापस लौटे और उनका दिल जोर से धड़क रहा था। फिर आप हजरता खदीजा के पास आये और फरमाया कि," मुझे चादर ओढ़ायो ! मुझे चादर ओढ़ायो ! उन्होंने आपको चादर ओढा दी जब तक आपका डर खत्म नहीं हुआ और उसके बाद आपने उन्हें जो कुछ भी हुआ था बताया और कहा," मुझे डर है कि मेरे साथ कुछ हो सकता है। हजरता खदीजा ने जवाब दिया," कभी नहीं! अल्लाह आपको कभी जलील नहीं करेगे। आप अपने रिश्तेदारों के साथ अच्छे रिश्ते रखते हैं, गरीबों और मोहताजों की मदद करते हैं, अपने मेहमानों की खातिरदारी करते हैं और हक़ के सिलसिले में पेश आने वाली तकलीफो में मदद करते है । हजरता खदीजा उन्हें साथ लेकर अपने चचेरे भाई वाराका बिन नौफल बिन असद बिन 'अब्दुल' उज्जा के पास आई , जो जहालत के समय मे एक ईसाई बन गए थे और इबरानी जुबान भी लिखना जानते थे। चुनाँचे वह इबरानी जुबान में जितना अल्लाह चाहते थे उतना लिखते थे । वह बूढ़े ओर अंधे हो चुके थे। हजरता खदीजा ने वाराका से कहा , "भाई, आप अपने भतीजे की बात सुनो!" वाराका ने पूछा, "मेरे भतीजे! आपने क्या देखा है? "अल्लाह के रसूल ने जो कुछ भी देखा था वो सब बयान किया। वाराका ने कहा," यह वही फरिश्ता है जिसे अल्लाह ने मूसा को भेजा था। काश मैं आपके नबी होने के जमाने मे ताकतवर होता और काश में उस वक़्त तक जिंदा रहू जब तक आपकी कोम आपको निकाल न दे । अल्लाह के रसूल ने पूछा," क्या वे मुझे बाहर निकाल देंगे? "वाराका ने जवाब दिया और कहा," कोई भी (आदमी) जो इस तरह का पैगाम लाया जैसा आप लाये उसके साथ दुश्मनी की गई ओर अगर मुझे आपका जमाना नसीब हुआ तो में जरूर आपकी मदद करूँगा उसके बाद वाराका की मौत हो गई और वहय भी थोड़ी देर तक रुक गई।


जाबीर बिन अब्दुल्ला अल अंसारी रजि अल्लाह तआला अन्हो से रिवायत है कि उन्होंने अल्लाह के रसूल की जुबानी वहय रुक जाने के बारे में सुना। आपने बयान फरमाया की जब मैं एक रास्ते से गुजर रहा था, अचानक मैंने आसमान से आवाज सुनी और उसी फरिश्ते को जो हीरा गुफा में आया था आसमान ओर जमीन के बीच कुर्सी पर बैठा है मैं उसे देख कर डर गया और घर वापस आया और कहा, 'मुझे चादर ओढ़े दो । और फिर अल्लाह ने कुरान को नाजिल किया ओर कहा : "ऐ चादर में लिपटे हुए मोहम्मद ! उठो और खबरदार करो और अपने रब की बड़ाई का ऐलान करो अपने कपड़े साफ रखो ओर गंदगी से दूर रहो । इसके बाद वहय लगातार तेज़ी से आना शुरू हों गयीं।"


अल्लाह के फरमान को समझाते हुए इबने अब्बास बयान करते है कि अल्लाह के रसूल वहय को जल्दी से याद करने के लिए अपनी जीभ को हरक़त न देते। कुरआन के उतरते वक़्त उसे याद करने के लिए रसूल अपनी होंठो को हिलाते थे जिससे तकलीफ होतीं थी इस पर अल्लाह ताला ने फरमाया की इस वाहय को याद करने के लिए जल्दी जल्दी अपने जुबान को हरकत न दो । इसको तुम्हारे दिल मे जमा करना ओर पढ़ा देना हमारी जिमेदारी है ओर फरमाया की कान लगाकर ध्यान से सुने ओर फिर इसका मतलब समझाना भी हमारी जिमेदारी है । इन आयात के उतरने के बाद जब जिब्राइल(फ़रिश्ता) आते ओर कुरान सुनाते तो अल्लाह के रसूल खामोशी से सुनते ओर उनके जाने के बाद उसी तरह पढ़ते जिस तरह जिब्राइल ने पढ़ा था।


इबने अब्बास रजि अल्लाह तआला अन्हो से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सभी लोगों से ज्यादा सखी थे खासकर रमदान में जब जिब्राइल से मुलाकात होती तो आप बहुत खर्च करते ओर जिब्राइल रमदान की हर रात में आपसे मिलते ओर क़ुरआन मजीद का दौर फरमाते। बेशक अल्लाह के रसूल सदक़ा करने में आंधी से भी ज्यादा तेज रफ्तार होते।


इबने अब्बास रजि अल्लाह तआला अन्हो से ही रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि अबू सुफियान बिन हर्ब रजि अल्लाह तआला अन्हो ने इनसे बयान किया कि रोम के बादशाह हिरक्ल ने अबू सुफियान को कुरैश की एक जमाअत समेत बुलवाया। यह जमाअत सुलह हुदैबिया के तहत रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और कुफ्फारे कुरैश के बीच तय शुदा वादे की मुद्दत में मुल्के शाम तिजारत की जरूरत के लिए गई हुई थी। यह लोग ईलिया (बैतुल मुकदस) में उसके पास हाजिर हो गये। हिरक्ल ने उन्हें अपने दरबार में बुलाया। उस वक्त उसके इर्द-गिर्द रोम के सरदार बैठे हुये थे। फिर उसने उनको और अपने तर्जुमान (मतलब बताने वाले) को बुलाकर कहा कि वह आदमी जो अपने आपको नबी समझता है, तुममें से कौन उसका करीबी रिश्तेदार हैं? अबू सुफियान ने कहा, मैं उसका सबसे ज्यादा करीबी रिश्तेदार हूँ, तब हिरक्ल ने कहा, इसे मेरे करीब कर दो और इसके साथियों को भी करीब करके इसके पास बिठाओ। उसके बाद हिरक्ल ने अपने तर्जुमान से कहा : इनसे कहो कि मैं इस आदमी से उस आदमी (नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के मुताल्लिक वालात करूंगा, अगर यह गलत बयानी करें तो तुम लोग इसको झुटला देना। अबू सुफियान ने कहा,कि अल्लाह की कसम! अगर झूट बोलने की बदनामी का डर नहीं होता तो मैं मुहम्मद सल्लललाहु अलैहि वसल्लम के बारे में जरूर झूट बोलता। अबू सुफियान कहते हैं कि इसके बाद पहला सवाल जो हिंरक्ल ने मुझ से आपके बारे में किया, वह यह था कि तुम लोगों में उसका खानदान कैसा है? मैंने कहा, वह ऊँचे खानदान वाला है। फिर कहने लगा, अच्छा! तो क्या यह बात उससे पहले भी तुममें से किसी ने कही थी? मैंने कहा,नहीं, कहने लगा, अच्छा उसके खानदान में से कोई बादशाह गुजरा है? मैंने कहा, नहीं। कहने लगा : अच्छा! यह बताओ कि बड़े लोगों ने उसकी पैरवी की है, या गरीबों ने ? मैंने कहा कमजोरों ने, कहने लगा: उसके मानने वाले (दिन-ब-दिन) बढ़ रहे हैं या कम हो रहे हैं? मैंने कहा, उनकी तादाद में बढ़ोतरी हो रही है। कहने लगा, उसके दीन में दाखिल होने के बाद कोई आदमी उसके दीन को नापसन्द करते हुए उसके दीन से फिर जाता हैं? मैंने कहा, नहीं! कहने लगा: उसने जो बात कही है, क्या उस (दावा-ए-नबूवत) से पहले तुम लोग उसको झूटा कहा करते थे? मैंने कहा : नहीं, कहने लगा: कया वह धोका देता है? मैंने कहा, नहीं! अलबत्ता हम लोग इस वक्त उसके साथ सुलह (राजीनामे) की एक मुद्दत गुजार रहे है, मालूम नहीं इसमें वह क्या करेगा? अबू सुफियान कहते हैं कि इस जुमले के सिवा मुझे और कहीं (अपनी तरफ से ) बात दाखिल करने का मौका नहीं मिला। कहने लगा : क्या तुम लोगों ने उससे जंग लड़ी है? मैंने कहा : जी हाँ! उसने कहा, फिर तुम्हारी और उसकी जंग कैसी रही? मैंने कहा, जंग में हम दोनों के बीच बराबर की चोट है, कभी वह हमें नुकसान पहुंचा लेता है और कभी हम उसे नुकसान से दो-चार कर देते हैं। कहने लगा: वह तुम्हें किन बातों का हुक्म देता हैं? मैंने कहा, वह कहता हैं सिर्फ अल्लाह की इबादत करो, उसके साथ किसी को शरीक न करो, जिनकी तुम्हारे बाप दादा इबादत करते थे, उनको छोड़ दो और वह हमें नमाज,सच्चाई, परहेजगारी, पाकदामनी और करीबी लोगों के साथ अच्छा बर्ताव करने का हुक्म देता है। उसके बाद हिरक्ल ने अपने तर्जुमान से कहा, तुम उस आदमी (अबू सुफियान) से कहो कि मैंने तुमसे उस आदमी (नबी सल्लललाहु अलैहि सलाम वसल्लम) का खानदान पूछा तो तुमने बताया कि वह ऊंचे खानदान का है और रिवाज यही है कि पैगम्बर (हमेशा)अपनी कौम के ऊंचे खानदान में से भेजे जाते हैं और मैंने पूछा कि क्या यह बात उससे पहले भी तुम में से किसी ने कहीं थी? तुमने बतलाया कि नहीं, मैं कहता हूँ कि अगर यह बात उससे पहले किसी और ने कही होती तो मैं कहता कि वह आदमी एक ऐसी बात की नकल कर रहा है जो उससे पहले कही जा चुकी है और मैंने पूछा कि उसके बुजुर्गों में से कोई बादशाह गुजरा है? तुमने बतलाया कि नहीं, मैं कहता हूँ कि अगर उसके बुजुर्गों में कोई बादशाह गुजरा होता तो मैं कहता कि वह आदमी अपने बाप की बादशाहतें का चाहने वाला है और मैंने यह पूछा कि जो बात उसने कही है, इस (दावा-ए-नबुव्वत) से पहले तुमने कभी उस पर झूट बोलने का इल्जाम लगाया था। तो तुमने बतलाया कि नहीं और मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि ऐसा नहीं हो सकता कि वह आदमी लोगों पर तो झूट बांधने से बचे और अल्लाह पर झूट बोले। मैंने यह भी पूछा कि बड़े लोग उसकी पैरवी कर रहे हैं या कमजोर? तो तुमने बतलाया कि कमजोर लोगों ने उसकी पैरवी की है और हकीकत यह है कि इस किरम के लोग ही पैगम्बरों के मानने वाले होते हैं। मैंने पूछा कि वह बढ़ रहे हैं या कम हो रहे हैं? तुमने बतलाया कि उनकी तादाद लगातार बढ़ रही है और दर हकीकत ईमान का यही हाल होता है, यहां तक कि वह पूरा हो जाता है। फिर मैंने पूछा कि क्या इस दीन में दाखिल होने के बाद कोई आदमी नफरत करते हुए उसके दीन से फिर जाता हैं? तो तुमने बतलाया कि नहीं और ईमान का यही हाल होता, है कि उसकी मिठास जब दिल में समा जाती है तो फिर निकलती नहीं और मैंने पूछा कि क्या वह वादा खिलाफी भी करता हैं? तो तुमने बतलाया कि नहीं और रसूल ऐसे ही होते हैं, वह धोका नहीं करते। मैंने यह भी पूछा कि वह तुम्हें किन बातों का हुक्म देता है, तो तुमने बतलाया कि वह अल्लाह की इबादत करने और उसके साथ किसी को शरीक ना ठहराने का हुक्म देता है, तुम्हें बुतपरस्ती से मना करता है और तुम्हें नमाज, सच्चाई और परहेजगारी व पाकदामनी इखितियार करने के लिए कहता है, तो जो कुछ तुमने बतलाया है, अगर वह सही हैं तो वह आदमी बहुत जल्द इस जगह का मालिक हो जायेगा, जहां मेरे यह दोनों कदम हैं। मैं जानता था कि यह नबी आने वाला है, लेकिन मेरा यह ख्याल न था कि वह तुम में से होगा। अगर मुझे यकीन होता कि मैं उसके पास पहुंच सकूंगा तो उससे जरूर मुलाकात करता, अगर मैं उसके पास (मदीना में) होता तो जरूर उसके पांव धोता । उसके बाद हिरक्ल ने रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का वह खत मंगवाया जो आपने दहिया कलबी रजि अल्लाह तआला अन्हो के जरीये हाकिमे बुसरा के पास भेजा था और उसने वह खत हिरक्ल को पहुंचा दिया था, हिरक्ल ने इसे पढ़ा, इसमें यह लिखा था, शुरू अल्लाह के नाम से जो बड़ा महरबान निहायत रहम करने वाला है। अल्लाह क॑ बन्दे और उसके रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तरफ से हिरक्ल अजीमे रोम के नाम। उस आदमी पर सलाम जो हिदायत की पैरवी करे, इसके बाद मैं तुझे कलमा-ए-इस्लाम “ला इलाहा इल्लल्लाहु मुहम्मर्दुरसूलुल्लाह'” की दावत देता हूँ। मुसलमान हो जा तू महफूज रहेगा, अल्लाह तआला तुझे दोहरा सवाब देगा, फिर अगर तू यह बात न माने तो तेरी रिआया (जनता) का गुनाह भी तुझी पर होगा। अहले किताब! एक ऐसी बात की तरफ आ जाओ जो हमारे और तुम्हारे वीच बरावर है। हम अल्लाह के सिवा किसी और की इबादत ना करें और उसके साथ किसी को शरीक ना करें और हममें से कोई अल्लाह के अलावा एक दूसरे को अपनी बिगड़ी बनाने वालों न समझे। पस अगर यह लोग फिर जायें तो साफ कह दों कि गवाह रहो, हम तो फरमां बरदार हैं”अबू सुफियान कहा, जब हिरक्ल जो कहना चाहता था कह चुका और खत पढ़कर फारिग हुआ तो वहां आवाजें बुलन्द हुई और बहुत शोर मचा और हम बाहर निकाल दिये गये। मैंने बाहर आकर अपने साथियों से कहा: अबू कबशा के बेटे (मुहम्मद स.अ.व.) का मामला बड़ा जोर पकड़ गया, इससे तो रोमियों का बादशाह भी डरता है, उस रोज के बाद मुझे बरावर यकीन रहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का दीन जरूर गालिब होगा, यहां तक कि अल्लाह तआला ने मेरे अन्दर इस्लाम पैदा कर दिया। इबने नातूर जो बैतुल मुकदस के गवर्नर हिरक्ल का कारसाज और शाम के ईसाइयों का पादरी था, बयान करता है कि हिरक्ल जब बैतुलमुकदइस आया तो एक रोज सुबह के वक्त गमी के साथ उठा और उसके कुछ साथी कहने लगे, हम देखते हैं कि आपकी हालत कुछ बुझी-बुझी है। इबने नातूर ने कहा कि हिरक्ल माहिरेनुजूमी और सितारों को पहचानने वाला था। जब लोगों ने उससे पूछा तो कहने लगा कि मैंने आज रात तारों पर एक निगाह डाली तो देखता हूँ कि खतना (मुसलमानी) करने बालों का बादशाह जाहिर हो चुका है (बताओ) इन दिनों कौन लोग खतना करते हैं? साथी कहने लगे, यहूदियों के सिवा कोई खतना नहीं करता। उनसे फिक्र मन्द होने की कोई जरूरत नहीं आप अपने इलाके बालों को परवाना (खबर) भेज दें कि तमाम यहूदियों को मार डालो। इस गुफ्तगू के दौरान ही हिरक्ल के सामने एक आदमी पेश किया गया, जिसे गस्सान के बादशाह ने भेजा था और वह रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का हाल बयान करता था, जब हिरक्ल ने इससे तमाम मालूमात हासिल कर ली तो कहने लगा कि इसे ले जाओ और देखो कि इसका खतना हुआ है या नहीं? लोगों ने इसे देखा और हिरक्ल को बताया कि इसका खतना हुआ है। हिरक्ल ने उससे पूछा कि अरब खतना करते हैं। उसने कहा, हाँ! वह खतना करते हैं तब हिरक्ल ने कहा, यही आदमी (पैगम्बर) इस उम्मत का बादशाह है, जिसका जहूर हो चुका है। फिर हिरक्ल ने अपने इल्म में हमपल्ला एक दोस्त को रूमियों में खत लिखा और खुद हिम्स रवाना हो गया, अभी हिम्स नहीं पहुंचा था कि उसे अपने दोस्त का जवाब मिल गया, उसकी राय भी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जाहिर होने में हिरक्ल की तरह थी कि आप नबी बरहक हैं, आखिर मुल्के हिम्स पहुंचकर उसने रूम के सरदारों को अपने महल आने की दावत दी। (जब वह आ गये) तो उसने हुक्म देकर दरवाजा बन्द करवा दिया, फिर बालकनी से उन्हें देखा और कहने लगा रूम के लोगों ! अगर तुम अपनी कामयाबी भलाई और बादशाहत पर कायम रहना चाहते हो तो उस पैगम्बर की बैयत कर लो, यह (ऐलाने हक) सुनते ही वह लोग जंगली गधों की तरह दरवाजों की तरफ दौड़े, देखा तो वह बंद थे। अब जब हिरक्ल ने इनकी नफरत को देखा और इनके ईमान लाने से मायूस हुआ तो कहने लगा, इन सरदाओ को मेरे पास लाओ। (जब वह आये) तो कहने लगा कि मैंने अभी जो बात तुमसे कही थी, वह सिर्फ आजमाने के लिए थी, कि देखूं तुम अपने दीन पर किस कदर मजबूत हो? अब मैं वह देख चुका, फिर तमाम हाजरीन ने उसे सज्दा किया और उससे राजी हो गये। यह हिरक्ल (के ईमान लाने) के मुत्ताल्लिक आखरी मालूमात हैं।

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