Skip to main content

12.वितर का बयान (Hadith no 413-420)

 

413.इबने उमर रजि अल्लाह तआला अन्हो से रिवायत है कि एक आदमी ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से रात की नमाज के बारे में पूछा तो आपने फरमाया कि रात की नमा दो दो रकअतें हैं और अगर तुममें से किसी को सुबह होने का डर हो तो वह एक रकअत और पढ़ ले, वह उसकी नमाज को वित्र बना देगी। वित्र की नमाज मुस्तकिल एक नमाज़ है जो इशा के बाद फजर तक रात के किसी हिस्से में पढ़ी जा सकती है, इसे तहज्जुद, कयाम-उल-लैल और तरावीह भी कहा जाता है। इसकी कम से कम एक रकअत और ज्यादा से ज्यादा तेरह रकअत हैं ज्यादातर इमामों के नजदीक वित्र की नमाज़ सुन्नत है, जिस पर जोर दिया गया है। इस हदीस से दो बातें साबित होती हैं। एक यह कि रात की नमाज दो दो रकअत करके पढ़ना चाहिए, दूसरी यह कि वित्र की एक रकअत पढ़ना भी साबित है।

 

 

414.आइशा रजि अल्लाह तआला अन्हो से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने तहज्जुद की नमाज ग्यारह रकअतें पढ़ा करते थे, रात के वक़्त आप की यही नमाज़ थी। इस नमाज़ में सज्दा इस कदर लम्बा करते कि आपके सर उठाने से पहले तुम में से कोई पचास आयतें तिलावत कर लेता है और फजर की नमाज से पहले दो रकअते सुन्नत भी पढ़ा करते, फिर अपनी दाई करवट लेट जाते, यहां तक कि अजान देने वाला आपके पास नमाज़ की खबर के लिए जाता तो उठ जाते। दूसरी रिवायत में है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रमजान या रमजान के अलावा कभी ग्यारह रकअत से ज्यादा नहीं पढ़ा करते थे, अलबत्ता बाज वक्तों में तेरह रकअतें पढ़ना भी साबित है। जैसा कि इब्ने अब्बास रजि अल्लाह तआला अन्हो ने बयान फरमाया है,नीज सुबह की सुन्नतें अदा करके दाई तरफ लेटना भी सुन्नत है। क्योंकि आप अच्छे कामों में दार्ई तरफ को पसन्द फरमाते थे।

 

 

415.आइशा रजि अल्लाह तआला अन्हो से ही रिवायत है, उन्होंने फरमाया कि रात के हर हिस्से में रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहि वसल्लम ने वित्र की नमाज़ अदा की है, मगर आखिर में आपकी वित्र की नमाज आखिर रात में होती थी। रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहि वसल्लम ने अलग अलग हालतों के मुताबिक अलग अलग वक्तों में वित्र अदा किये हैं, शायद तकलीफ और मर्ज में पहली रात में, सफर की हालत में बीच रात में,और आम अमल आखिर रात में पढ़ने का था। अलबत्ता उम्मत की आसानी के लिए इशा के बाद जब भी मुमकिन हो, वित्र अदा करना जाइज है।

 

 

416.इबने उमर रजि अल्लाह तआला अन्हो से रिवायत है, उन्होंने कहा कि नबी सल्लललाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया लोगों! तुम रात की आखरी नमाज़ वित्र को बनाओ। इस रिवायत से पता चलता है कि वित्र की नमाज को सबसे आखिर में पढ़ना चाहिए इसके बरखिलाफ वित्र के बाद दो रकअत बैठकर अदा करना नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सही हदीसों से साबित नहीं। जैसा कि इस बात पर कुछ लोगों का अमल है। लिहाजा हमें चाहिए कि हम रात की सबसे आखिरी नमाज वित्र को बनायें

 

 

417.अब्दुल्लाह बिन उमर रजि अल्लाह तआला अन्हो से ही रिवायत है, उन्होंने फरमाया रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ऊंट पर सवार होकर वित्र पढ़ लिया करते थे। इस हदीस से मालूम हुआ कि वित्र की नमाज़ वाजिब नहीं है,अगर ऐसा होता तो इसे सवारी पर अदा किया जाता।

 

 

418.अनस रजि अल्लाह तआला अन्हो से रिवायत है, उनसे पूछा गया कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फज की नमाज में कुनूत पढ़ी है? उन्होंने जवाब दिया,हां। फिर पूछा क्या रूकू से पहले आपने कुनूत पढ़ी थी? उन्होंने कहा, रूकू के बाद थोड़े दिनों के लिए। इस हदीस में वित्र के कुनूत का जिक्र नहीं, बल्कि कुनूते नाजिला का जिक्र है। शायद इमाम बुखारी ने यह कयास किया हो कि जब फर्ज नमाज में कुनूत पढ़ना जाइज हो तो वित्र में और ज्यादा जाइज होगा। कुनूते कब पढ़ा जाये, इसके बारे में निसाई में वजाहत है कि वितरों में कुनूत रूकू से पहले है और मुस्लिम की रिवायत के मुताबिक कुनूते नाजिला रूकू के बाद है। अगर कुनूते वित्र में दीगर दुआयें भी शामिल कर ली जायें तो उसे भी रूकू के बाद पढ़ना चाहिए। वरना कुनूत वित्र रूकू से पहले है।

 

 

419.अनस रजि अल्लाह तआला अन्हो से ही रिवायत है, उनसे कुनूत के बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि बेशक कुनूत पढ़ी जाये फिर पूछा गया कि रूकू से पहले या रूकू के बाद? उन्होंने कहा, रूकू से पहले, फिर जब उनसे कहा गया कि फलां आदमी तो आपसे नकल करता है कि आपने रूकू के बाद फरमाया है। अनस रजि अल्लाह तआला अन्हो बोले वह गलत कहता है। रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहि वसल्लम ने सिर्फ एक महीना रूकू के बाद कुनूत पढ़ी है और मेरा खयाल है कि आपने मुश्रिकों की तरफ तकरीबन सत्तर आदमी खयाल है कि आपने मुश्रिकों की तरफ तकरीबन सत्तर आदमी भेजे। जिन्हें कारी कहा जाता था, यह मुश्रिक उन मुश्रिकों के अलावा थे, जिनके और रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहि वसल्लम के बीच सुलहनामें का वादा हुआ था। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दुआ--कुनूत पढ़ी और एक माह तक उनके लिए बद-दुआ करते रहे। इन्हीं से एक रिवायत में यह है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक माह तक दुआ--कुनूत पढ़ी और कबीला रेअल और जृकवान के लिए बद-दुआ फरमाते रहे। जंगी हालतों के मुताबिक हर नमाज में दुआ--कुनूत की जा सकती है। नीज मालूम हुआ कि जुल्म करने वाले लोगों पर नमाज में बद-दुआ करने से नमाज में कोई फर्क नहीं आता।

 

 

420.अनस रजि अल्लाह तआला अन्हो से हीं यह रिवायत भी है, उन्होंने फरमाया कि कुनूत मगरिब और फज़ की नमाज में पढ़ी जाती थी। मगरिब की नमाज चूंकि दिन के वित्र हैं और इसमें कुनूत करना साबित है तो रात के वितरों में कुनूत और ज्यादा की जा सकती है। इसके अलावा वित्रों में कुनूत करने का बयान हदीसों में भी मौजूद है।

 

 

Comments

Popular posts from this blog

05.ग़ुस्ल का बयान (Hadith no 145-159)

  145. आइशा रजि अल्लाह तआला अन्हो से रिवायत है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब नापाकी का गुस्ल फरमाते तो पहले दोनों हाथ धोते , फिर नमाज के वुजू की तरह वुजू करते , उसके बाद अपनी उंगलियाँ पानी में डालकर बालों की जड़ों का खिलाल करते , फिर दोनों हाथों से तीन चुल्लू पानी लेकर अपने सर पर डालते , उसके बाद अपने तमाम जिस्म पर पानी बहाते। गुस्ल में बदन पर पानी बहाने से फर्ज अदा हो जाता है , लेकिन सुन्नत तरीका यह है कि पहले वुजू किया जाये।       146. मैमूना रजि अल्लाह तआला अन्हो से रिवायत है , उन्होंने फरमाया कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने गुस्ल के वक्त पहले नमाज के वुजू की तरह वुजू किया , लेकिन पांव नहीं धोये , अलबत्ता अपनी शर्मगाह और जिस्म पर लगने वाली गन्दगी को धोया , फिर अपने ऊपर पानी बहाया , उसके बाद गुस्ल की जगह से अलग होकर अपने दोनों पांव धोये आपका नापाकी का गुस्ल यही था। गुस्ल के लिए जरूरी है कि पहले पर्दे का ...

17.कसर नमाज का बयान (Hadith no 463-476)

  463. इबने अब्बास रजि अल्लाह तआला अन्हो से रिवायत है , उन्होंने फरमाया कि नबी सल्लललाहु अलैहि वसल्लम सफर ( फतह मक्का ) में उननीस दिन ठहरे और इस अरसे में कसर करते रहे। हिजरत के चौथे साल कसर की आयत नाजिल हुई , मगरिब और फजर की फर्ज नमाज में कसर नहीं है और न ही उस सफर में कसर की इजाजत है जो गुनाह की नियत से किया जाये। सुन्नत की पैरवी का तकाजा यही है कि सफर के बीच कसर की नमाज पढ़ी जाये , अगरचे पूरी जाइज हैं फिर भी अफजल कसर है , हदीस में जिस सफर का जिक्र है , वह फतह मक्का का है , चूंकि यह हंगामी दिन थे और फुरस्त के लम्हे हासिल होने का इल्म न था। इसलिए इन दिनों में कसर करते रहें यकीनी इकामते पर चार दिन तक के लिए कसर की इजाजत है। बशर्ते कि सफर की दूरी भी कम से कम नौ मील हो।     464. अनस रजि अल्लाह तआला अन्हो से रिवायत है कि हम नबी सल्लललाहु अलैहि वसल्लम के साथ मदीना से मक्का तक गये। आप इस दौरान दो दो रकअत ...

22.जनाजे का बयान (Hadith no 519-585)

  519. अबू जर रजि अल्लाह तआला अन्हो से रिवायत है , उन्होंने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया , मेरे रब की तरफ से मेरे पास एक आने वाला आया , उसने मुझे खुशखबरी दी कि मेरी उम्मत में से जो आदमी इस हालत में मरे कि वह अल्लाह के साथ किसी को शरीक न करता हो तो वह जन्नत में दाखिल होगा , मैंने कहा अगरचे उसने जिना और चोरी की हो। आपने फरमाया , हां अगरचे उसने जिना किया हो और चोरी भी की हो । मतलब यह है कि जो आदमी तौहीद पर मरे तो वह हमेशा के लिए जहन्नम में नहीं रहेगा , आखिरकार जन्नत में दाखिल होगा , चाहे अल्लाह के हक जैसे जिना और लोगों के हक जैसे चोरी ही क्यों न हो। ऐसी हालत में लोगों के हक की अदायगी के बारे में अल्लाह जरूर कोई सूरत पैदा करेगा।   अब्दुल्लाह रजि अल्लाह तआला अन्हो ने फरमाया कि जो आदमी शिर्क की हालत में मर जाये वो दोजख में जायेगा और यह कहता हूं जो आदमी इस हाल में मर जाये कि अल्लाह के साथ किसी ...